भारत के संविधान में नाजायज़ घुसपैठ की वज़ह से गाली बन चुका है ‘सेकुलरिज़्म’

भारत के संविधान में सबसे भद्दा मजाक है सेकुलर शब्द। ये सेकुलर शब्द संविधान निर्माण के समय संविधान की प्रस्तावना में नहीं था। इंदिरा गांधी के शासन काल में 1976 में 42वां संविधान संशोधन करके सेकुलर और सोशलिस्ट शब्द जोड़ दिया गया था। अब तक संविधान की प्रस्ताव ना में भारत के लिए संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य शब्द का प्रयोग होता था लेकिन इंदिरा गांधी सरकार ने इसे संप्रभु, लोकतांत्रिक, सेकुलर, समाजवादी गणराज्य बना दिया। ये सेकुलर और समाजवादी शब्द आखिर क्यों जोड़े गये? जब संविधान सभा की बहस में नेहरू, अंबेडकर सबने सेकुलर शब्द को खारिज कर दिया था तब इंदिरा गांधी ने इतना बड़ा कदम क्योंकर उठा लिया? 

संविधान की मूल प्रस्तावना जिसमें सेकुलर और सोशलिस्ट शब्द नहीं है।

इसके पीछे कम्युनिस्टों की साजिश थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रायबरेली से इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध करार दे दिया था। उनकी प्रधानमंत्री की कुर्सी खतरे में आ गयी थी क्योंकि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनके चुनाव लड़ने या किसी भी सरकारी कार्यालय में प्रवेश पर छह साल की रोक लगा दिया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट के इसी निर्णय के बाद भारत की राजनीति में भूचाल आ गया। विपक्षी दलों ने इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री की कुर्सी से हटाने का अभियान चला दिया तो इंदिरा गांधी ने विपक्षी दल के नेताओं की गिरफ्तारी शुरु करवा दिया। राज्य सरकारों को भी बर्खास्त किया और आखिर में आपातकाल घोषित कर दिया।

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इसी उथल पुथल भरे समय में जब इंदिरा गांधी को राजनीतिक समर्थन की जरूरत थी तब लोकतंत्र विरोधी कम्युनिस्ट उनके बचाव में आये। उन्होंने इंदिरा गांधी को राजनीतिक समर्थन तो दिया लेकिन सेकुलर और सोशलिज्म शब्द को संविधान का हिस्सा बनवा दिया। इंदिरा गांधी उस समय संविधान में कई तरह के मनमानी संशोधन कर रही थीं, इसलिए ये संशोधन भी कर दिया। उन्हें राजनीतिक समर्थन की जरूरत थी और कम्युनिस्टों को अपनी साजिश को सफल बनाने की जल्दबाजी। इसलिए अंबेडकर, नेहरू और संविधान सभा की पूरी बहस को किनारे करते हुए उन्होंने संविधान में सेकुलर और सोशलिस्ट शब्द जुड़वा दिया।

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संविधान में ये दो शब्द भारत की आत्मा नहीं कम्युनिस्टों के षण्यंत्र का नतीजा है। कम्युनिस्ट भारत की बुनियाद पर चोट करना चाहते थे इसलिए उन्होने संविधान सभा की बहस और नेहरू अंबेडकर का गोला घोंटते हुए इन दो शब्दों का संविधान में शामिल करवा लिया। वरना, जब संविधान सभा में सेकुलर शब्द जोड़ने की बात आयी तो अंबेडकर, नेहरू और लोकनाथ मिश्रा सबने एक साथ मुखर रूप से इसे निरस्त कर दिया था।

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अब 45 साल बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बार फिर इस सेकुलर शब्द के औचित्य पर सवाल खड़ा किया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से पूछा है कि मदरसों व अन्य धार्मिक शिक्षण संस्थानों को किस आधार पर पैसा दिया जाता है? क्या एक सेकुलर स्टेट में ऐसा किया जा सकता है? अगर भारत संवैधानिक रूप से सेकुलर स्टेट है फिर माइनॉरिटी और मेजोरिटी का बंटवारा कैसे हो सकता है? संविधान में जब माइनॉरिटी शब्द डाला गया था तब सेकुलर शब्द नहीं था। जब सेकुलर शब्द आ गया फिर मॉइनॉरिटी का अस्तित्व कैसे रह सकता है?

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समय आ गया है कि भारत के संविधान में से एक शब्द को हटा दिया जाए। या तो सेकुलर और सोशलिस्ट शब्द को बाहर निकालकर संविधान की मूल प्रस्तावना को वापस लाया जाए या फिर रिलिजियस मॉइनॉरिटी स्टेटस समाप्त किया जाए। ये विरोधाभाष हमारे संविधान का भद्दा मजाक बना रहा है।

~संजय तिवारी

(वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक और Visfot Media के कर्ताधर्ता)

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