एक ज़हालत से निकलकर दूसरी अपनाना ही 'किरांती' है रे बाबा !

भारत वो वाहिद मुल्क़ है जहाँ पुरानी और वाहियात रवायतों-परंपराओं का अंधा पालन जितनी जहालत और कट्टरता से होता आया है, उनके बदले में नई और वाहियात रवायतों-परंपराओं की अंधी स्थापना भी उतनी ही जहालत और कट्टरता से की जाती है.
Photo : WakeUp-World.com 
जितनी सदियाँ यहाँ के लोगों ने स्त्रियों के मासिक स्राव को उनके प्रति छुआछूत और घृणा की वजह बनाने में ख़र्च कर दीं बजाय उन्हें उन दिनों में साफ़-सफ़ाई के बेहतर इंतज़ाम मुहैया करवाने और इसे एक सामान्य शारीरिक अपशिष्ट-उत्सर्जन के तौर पर लेने के; अब यहाँ उतनी ही सदियाँ स्त्रियों के मासिक स्राव को 'सृजनात्मकता का अलौकिक, चमत्कारी, दिव्य और पूज्यनीय आधार' बताने में ख़र्च की जाएँगी, बजाय यह सुनिश्चित करने के कि देश के दूर-दराज़ के इलाक़ों में जहाँ आज भी औरतों को मासिक स्राव के दिनों में साफ़ या हाइजीनिक कपड़े या नैपकिन हासिल नहीं होते, वहाँ वो उन्हें मुहैया हो सकें.

यहाँ पोते-पोतियाँ भी उतने ही जाहिल, अंधे और परले दरजे के घामड़ साबित होंगे जितने उनके दादा-दादियाँ होते रहे हैं. फ़र्क़ बस दिशा का रहेगा. वो मासिक स्राव को 'अधार्मिक' और 'पापजनक' बता कर उतने दिन स्त्रियों को अछूत पशु बना दिया करते थे, यह ठीक उल्टी दिशा में घूम कर उसी मासिक स्राव को 'क्रांतिकारी' और 'चमत्कारी' घोषित करने के लिए उसकी ही इबादत के नए-नए तरीक़े ईजाद कर रहे हैं. बल्कि यह आविष्कार जितने ज़ोरों-शोरों से किए जा रहे हैं, मुझे पूरी उम्मीद है कि मौक़े का फ़ायदा उठाते हुए इस नई क्रांति की कारोबारी संभावनाओं को भुनाने के लिए शायद कुछ वक़्त में बाज़ार में 'Menstrual Discharge' फ़्लेवर के जैम, कैचप वगैरह भी उतार दिए जाएँगे, और उन्हें मुँहमाँगे दामों पर इतराते हुए ख़रीदने और नोश फ़रमाने वाले बहादुर क्रांतिकारी भी ठीक-ठाक तादाद में यहाँ मिल जाएँगे.

कुल मिलाकर, हिंदुस्तान जाहिलाबाद था, जाहिलाबाद है और जाहिलाबाद रहेगा. सन्नी पा' जी अगर 'ग़दर-2' बनाएँ तो इस बारी लाहौर में दहाड़ते हुए अपना डायलॉग अपडेट ज़रूर कर लें.



-अरविंद अरोड़ा, फिल्म क्रिटिक एवँ लेखक

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